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ब्रिक्स (BRICS) : A to Z

 ब्रिक्स (BRICS) 

ब्रिक्स दुनिया की पांच उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं के समूह का संक्षिप्त रूप है:

  • B: Brazil (ब्राजील)
  • R: Russia (रूस)
  • I: India (भारत)
  • C: China (चीन)
  • S: South Africa (दक्षिण अफ्रीका) 

नोट: हाल के वर्षों (2024-2025) में इसमें मिस्र, इथियोपिया, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और इंडोनेशिया जैसे देश भी शामिल हुए हैं, जिससे अब इसे अक्सर 'BRICS+' भी कहा जाता है।

ब्रिक्स (BRICS) की स्थापना: 'BRIC' (ब्रिक) शब्द का प्रयोग पहली बार 2001 में ब्रिटिश अर्थशास्त्री जिम ओ'नील द्वारा ब्राज़ील, रूस, भारत और चीन की उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए किया गया था। एक औपचारिक समूह के रूप में इसने 2006 में G-8 आउटरीच शिखर सम्मेलन के दौरान काम करना शुरू किया और इसका पहला आधिकारिक शिखर सम्मेलन 2009 में रूस में आयोजित किया गया था। वर्ष 2010 में दक्षिण अफ्रीका के इसमें शामिल होने के बाद इस समूह का नाम बदलकर 'BRICS' (ब्रिक्स) हो गया।

वर्तमान सदस्य देश: वर्तमान में ब्रिक्स में कुल 10 पूर्ण सदस्य देश हैं।

शुरुआती 5 सदस्य: ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका।

2024 में शामिल सदस्य: ईरान, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), मिस्र और इथियोपिया ने 2024 में पूर्ण सदस्यता प्राप्त की।

• 2025 में शामिल सदस्य: हाल ही में हुए 17वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में इंडोनेशिया आधिकारिक तौर पर इसका नवीनतम पूर्ण सदस्य बन गया है। (नोट: सऊदी अरब ने अभी तक अपनी सदस्यता को औपचारिक रूप नहीं दिया है, और अर्जेंटीना ने इसमें शामिल होने से इनकार कर दिया था।)

स्थापना का मूल उद्देश्य: ब्रिक्स की स्थापना और इसके विस्तार के मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं:

• वैश्विक संस्थानों में सुधार (Multilateral Reform): संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC), विश्व व्यापार संगठन (WTO), अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और विश्व बैंक जैसी संस्थाओं में सुधार की वकालत करना ताकि वे विकासशील देशों (Global South) और उभरते बाजारों की भूमिका को सही ढंग से दर्शा सकें।

• पश्चिमी प्रभुत्व को संतुलित करना: पश्चिमी देशों के दबदबे वाले G7 समूह के सामने एक मजबूत और गैर-पश्चिमी कूटनीतिक विकल्प (counterbalance) तैयार करना।

• पारस्परिक सहयोग और ऊर्जा सुरक्षा: सदस्य देशों के बीच आर्थिक असमानता को कम करना, ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करना (विशेषकर नए तेल उत्पादक देशों के जुड़ने के बाद), और व्यापार व तकनीकी विकास में एक-दूसरे का सहयोग करना

ब्रिक्स (BRICS) की यात्रा एक विचार के रूप में शुरू हुई और आज यह वैश्विक राजनीति का एक शक्तिशाली मंच बन चुका है। इसके अस्तित्व में आने के प्रमुख पड़ाव यहाँ दिए गए हैं:

1. एक विचार के रूप में (2001)

'BRIC' शब्द को सबसे पहले 2001 में गोल्डमैन सैक्स के अर्थशास्त्री जिम ओ'नील ने गढ़ा था। उन्होंने भविष्यवाणी की थी कि ये उभरती हुई अर्थव्यवस्थाएं (ब्राजील, रूस, भारत और चीन) भविष्य में वैश्विक अर्थव्यवस्था का नेतृत्व करेंगी।

2. औपचारिक शुरुआत (2006)

सितंबर 2006 में न्यूयॉर्क में आयोजित संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान इन चारों देशों के विदेश मंत्रियों की पहली बैठक हुई। यहीं से इस समूह को एक औपचारिक राजनीतिक मंच के रूप में पहचान मिली।

3. पहला शिखर सम्मेलन (2009)

ब्रिक्स आधिकारिक तौर पर पूर्ण रूप से 16 जून 2009 को अस्तित्व में आया, जब रूस के येकातेरिनबर्ग (Yekaterinburg) में इसका पहला शिखर सम्मेलन (Summit) आयोजित किया गया।

महत्वपूर्ण बदलाव: BRIC से BRICS

  • 2010: दक्षिण अफ्रीका को इस समूह में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया गया।
  • 2011: दक्षिण अफ्रीका ने चीन के सान्या में आयोजित तीसरे शिखर सम्मेलन में पहली बार भाग लिया और इसका नाम बदलकर BRICS हो गया।
  • प्रो टिप: अगर आपसे कोई पूछे कि यह "अस्तित्व" में कब आया, तो 2006 (औपचारिक बैठक) और 2009 (पहला शिखर सम्मेलन) सबसे सटीक उत्तर माने जाते हैं।

👉ब्रिक्स शिखर सम्मेलनों की सूची (तारीखों के साथ)

    1. पहला सम्मेलन: 16 जून 2009, रूस (येकातेरिनबर्ग) 

    2. दूसरा सम्मेलन: 15 अप्रैल 2010,  ब्राजील (ब्रासीलिया)

    3. तीसरा सम्मेलन: 14 अप्रैल 2011, चीन (सान्या) - दक्षिण अफ्रीका पहली बार शामिल। 

    4. चौथा सम्मेलन: 29 मार्च 2012 , भारत (नई दिल्ली) 

    5. पांचवां सम्मेलन: 26-27 मार्च 2013, दक्षिण अफ्रीका (डरबन) 

    6. छठा सम्मेलन: 15-16 जुलाई 2014 , ब्राजील (फोर्टालेजा) 

    7. सातवां सम्मेलन: 8-9 जुलाई 2015, रूस (उफ़ा) 

    8.आठवां सम्मेलन: 15-16 अक्टूबर 2016, भारत (गोवा) 

    9. नौवां सम्मेलन: 3-5 सितंबर 2017 , चीन (ज़ियामेन) 

    10. दसवां सम्मेलन: 25-27 जुलाई 2018 , दक्षिण अफ्रीका (जोहान्सबर्ग) 

    11. ग्यारहवां सम्मेलन: 13-14 नवंबर 2019 , ब्राजील (ब्रासीलिया) 

    12. बारहवां सम्मेलन: 17 नवंबर 2020  रूस (वर्चुअल)

    13. तेरहवां सम्मेलन: 9 सितंबर 2021, भारत (वर्चुअल) 

    14. चौदहवां सम्मेलन: 23-24 जून 2022 , चीन (वर्चुअल)

    15. पंद्रहवां सम्मेलन: 22-24 अगस्त 2023, दक्षिण अफ्रीका (जोहान्सबर्ग)                

    16. सोलहवां सम्मेलन: 22-24 अक्टूबर 2024 , रूस (कज़ान) 

    17. सत्रहवां सम्मेलन: फरवरी 2026 , ब्राजील (रियो डी जेनेरियो) 

👉17वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में रियो घोषणा के मुख्य बिंदु क्या थे?

ब्राज़ील के रियो डी जेनेरियो में आयोजित 17वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में 'रियो डी जेनेरियो घोषणा' (Rio de Janeiro Declaration) पर हस्ताक्षर किए गए, जिसका मुख्य विषय "अधिक समावेशी और सतत शासन के लिए ग्लोबल साउथ सहयोग को मजबूत करना" था।

इस घोषणा और शिखर सम्मेलन के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:

• वैश्विक शासन और संस्थागत सुधार (Global Governance Reform): इस घोषणा में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) के विस्तार का समर्थन किया गया ताकि एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के देशों (ग्लोबल साउथ) को स्थायी सदस्यता मिल सके। इसके साथ ही, IMF और विश्व बैंक (World Bank) में सुधार और एक नियम-आधारित विश्व व्यापार संगठन (WTO) की वकालत की गई।

• सतत विकास और जलवायु वित्त (Sustainable Development & Climate Finance): विकासशील देशों के लिए संसाधन जुटाने हेतु 'जलवायु वित्त पर लीडर्स फ्रेमवर्क घोषणा' को अपनाया गया और कार्बन प्राइसिंग व उत्सर्जन व्यापार को बेहतर बनाने के लिए 'ब्रिक्स कार्बन मार्केट्स पार्टनरशिप' पर एक समझौता (MoU) किया गया। इसके अलावा, ब्रिक्स देशों ने यूरोपीय संघ (EU) के 'कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म' (CBAM) जैसे प्रतिबंधात्मक व्यापार उपायों की कड़ी निंदा की और उन्हें खारिज कर दिया।

• शांति और वैश्विक सुरक्षा (Peace and Security): सदस्य देशों ने गाजा में तत्काल युद्धविराम और द्वि-राज्य समाधान (two-state solution) का आह्वान किया तथा "अफ्रीकी समस्याओं के लिए अफ्रीकी समाधान" के सिद्धांत की पुष्टि की। भारत के जोर देने पर आतंकवाद को सिद्धांत रूप से खारिज करने की बात कही गई और पहलगाम आतंकी हमले की निंदा की गई।

• वित्तीय सहयोग और डी-डॉलराइजेशन (Financial Cooperation): अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता को कम करने के लिए एक क्रॉस-बॉर्डर पेमेंट्स इनिशिएटिव (सीमा पार भुगतान पहल) पर बातचीत को आगे बढ़ाया गया। साथ ही, न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) के विस्तार और निवेश के जोखिमों को कम करने के लिए 'ब्रिक्स मल्टीलेटरल गारंटी' (BMG) पायलट प्रोजेक्ट का समर्थन किया गया।

• प्रौद्योगिकी और अंतरिक्ष सहयोग (Technology and Space): 'ग्लोबल एआई गवर्नेंस' (Global AI Governance) पर बयान अपनाया गया और डेटा इकोनॉमी गवर्नेंस पर सहमति बनी। इसके अलावा, सदस्य देशों ने अंतरिक्ष अन्वेषण में सहयोग के लिए 'ब्रिक्स स्पेस काउंसिल' (BRICS Space Council) बनाने पर भी सहमति व्यक्त की।

• स्वास्थ्य और सामाजिक विकास (Health): स्वास्थ्य असमानताओं को दूर करने और विशेष रूप से तपेदिक (Tuberculosis) जैसी बीमारियों से निपटने के लिए एक नई साझेदारी (Partnership for the Elimination of Socially Determined Diseases) की शुरुआत की गई।

👉रियो घोषणा में ग्लोबल साउथ के लिए क्या खास था?

7वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में अपनाई गई 'रियो डी जेनेरियो घोषणा' में ग्लोबल साउथ (Global South) के हितों और प्रतिनिधित्व को लेकर कई विशेष बातें शामिल थीं:

• मुख्य विषय (Theme): इस शिखर सम्मेलन का मुख्य विषय ही "अधिक समावेशी और सतत शासन के लिए ग्लोबल साउथ सहयोग को मजबूत करना" था, जो ग्लोबल साउथ के प्रति ब्रिक्स देशों की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

• संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में प्रतिनिधित्व: घोषणा में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के विस्तार का पुरजोर समर्थन किया गया। इसमें इस बात पर जोर दिया गया कि एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका (ग्लोबल साउथ) के देशों को अधिक संख्या में स्थायी सदस्यता मिलनी चाहिए ताकि वैश्विक मंच पर उनका प्रतिनिधित्व बढ़ सके।

• वैश्विक वित्तीय संस्थाओं में सुधार: उभरते बाजारों और विकासशील देशों (EMDCs) की भूमिका को वैश्विक स्तर पर सही ढंग से दर्शाने के लिए अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और विश्व बैंक (World Bank) में सुधार का आग्रह किया गया।

• जलवायु वित्त (Climate Finance): विकासशील देशों के लिए संसाधन जुटाने के उद्देश्य से विशेष रूप से 'जलवायु वित्त पर लीडर्स फ्रेमवर्क घोषणा' (Leaders’ Framework Declaration on Climate Finance) को अपनाया गया।

• अफ्रीकी देशों का समर्थन: शांति और सुरक्षा के मामलों में "अफ्रीकी समस्याओं के लिए अफ्रीकी समाधान" के सिद्धांत की पुष्टि की गई, जो ग्लोबल साउथ के एक प्रमुख हिस्से (अफ्रीका) की स्वायत्तता का समर्थन करता है।

• पश्चिमी प्रभुत्व को चुनौती: इन पहलों के माध्यम से ब्रिक्स को ग्लोबल साउथ के प्रतिनिधित्व के लिए एक शक्तिशाली ब्लॉक (गुट) के रूप में उभारने और पश्चिमी प्रभुत्व वाले सिस्टम को चुनौती देकर समावेशी विकास को बढ़ावा देने पर ध्यान केंद्रित किया गया।

👉क्या ब्रिक्स की अपनी कोई मुद्रा बनाने की योजना है?

दिए गए स्रोतों के अनुसार, फिलहाल ब्रिक्स (BRICS) की अपनी कोई एक साझा मुद्रा (Common BRICS Currency) बनाने की कोई ठोस योजना नहीं है। हाल ही में हुए ब्रिक्स के विस्तार के बाद एक साझा ब्रिक्स मुद्रा का विचार काफी हद तक असंभव (unlikely) प्रतीत होता है।

हालाँकि, एक नई मुद्रा बनाने के बजाय, ब्रिक्स देश अमेरिकी डॉलर पर अपनी निर्भरता कम करने (डी-डॉलराइजेशन) के लिए अन्य रणनीतियों पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं:

• स्थानीय मुद्राओं में व्यापार: ईरान, रूस और चीन जैसे सदस्य देश आपस में व्यापार करने के लिए डॉलर के बजाय पहले से ही अपनी स्थानीय मुद्राओं का उपयोग कर रहे हैं।

• नई भुगतान प्रणाली पर विचार: 17वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में, अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता को कम करने के लिए एक 'सीमा पार भुगतान पहल' (Cross-Border Payments Initiative) पर बातचीत को काफी आगे बढ़ाया गया है।

• वित्तीय संस्थाओं को मजबूती: सदस्य देशों ने 'न्यू डेवलपमेंट बैंक' (NDB) के विस्तार और निवेश के जोखिमों को कम करने के लिए 'ब्रिक्स मल्टीलेटरल गारंटी' (BMG) पायलट प्रोजेक्ट का समर्थन किया है।

निष्कर्षतः ब्रिक्स देश किसी एक नई मुद्रा (जैसे यूरो) को अपनाने के बजाय वर्तमान में अपनी-अपनी मुद्राओं के उपयोग को बढ़ावा देने और एक स्वतंत्र एवं वैकल्पिक सीमा पार भुगतान प्रणाली विकसित करने पर अधिक ज़ोर दे रहे हैं

👉ब्रिक्स में शामिल हुए नए सदस्यों की क्या भूमिका होगी?

ब्रिक्स (BRICS) में नए सदस्यों (जैसे 2024 में शामिल हुए ईरान, यूएई, मिस्र और इथियोपिया तथा 2025 में शामिल हुए इंडोनेशिया) के जुड़ने से वैश्विक मंच पर इस समूह की भूमिका और भी महत्वपूर्ण एवं प्रभावशाली हो गई है। ब्रिक्स में नए सदस्यों की प्रमुख भूमिकाएँ और इसके रणनीतिक प्रभाव निम्नलिखित होंगे:

• ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security) में वैश्विक दबदबा: ईरान और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) जैसे प्रमुख तेल उत्पादक देशों के ब्रिक्स में शामिल होने से, अब वैश्विक कच्चे तेल के उत्पादन में ब्रिक्स की हिस्सेदारी लगभग 44% हो गई है। इससे तेल की कीमतों, ऊर्जा सुरक्षा और वैश्विक आपूर्ति शृंखला (supply chains) को नियंत्रित और प्रभावित करने में ब्रिक्स एक प्रमुख ताकत बन गया है।

• गैर-पश्चिमी देशों का सशक्त प्रतिनिधित्व: नए देशों के आने से ब्रिक्स का वैश्विक दायरा (global footprint) बढ़ा है। अब यह समूह पश्चिमी देशों के प्रभुत्व वाले G7 के एक मजबूत विकल्प (counterbalance) और G20 में एक शक्तिशाली गुट के रूप में कार्य कर रहा है। यह असमानता और वैश्विक संस्थाओं (जैसे UNSC, IMF, World Bank) में विकासशील देशों (Global South) के कम प्रतिनिधित्व के मुद्दों को और अधिक मजबूती से उठाएगा।

• डी-डॉलराइजेशन (De-dollarization) को गति: ईरान जैसे नए सदस्य, जो पहले से ही रूस और चीन के साथ अपनी स्थानीय मुद्राओं में व्यापार कर रहे हैं, आपसी व्यापार में अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करने के ब्रिक्स के प्रयासों को और बल देंगे।

कुछ नई भू-राजनीतिक चुनौतियाँ (Geopolitical Contradictions): नए सदस्यों के शामिल होने से ब्रिक्स को मजबूत तो किया है, लेकिन इससे समूह के भीतर कुछ भू-राजनीतिक विरोधाभास भी उत्पन्न हुए हैं। उदाहरण के लिए, एक तरफ जहाँ यूएई (UAE) और मिस्र के अमेरिका के साथ मजबूत रणनीतिक गठबंधन हैं, वहीं दूसरी तरफ ईरान का रुख अमेरिका के प्रति शत्रुतापूर्ण है। चूंकि ब्रिक्स में सभी फैसले सर्वसम्मति (consensus) से लिए जाते हैं, इसलिए सदस्यों की इन अलग-अलग विदेश नीतियों के कारण भविष्य में तेजी से निर्णय लेने की प्रक्रिया जटिल हो सकती है।

👉रियो घोषणा में डिजिटल और AI पर क्या सहमति बनी?

17वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की 'रियो घोषणा' में प्रौद्योगिकी और डिजिटल अर्थव्यवस्था (Technology and Digital Economy) के मोर्चे पर कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और डेटा के संबंध में प्रमुख रूप से निम्नलिखित सहमतियां बनीं:

• वैश्विक AI प्रशासन (Global AI Governance): ब्रिक्स देशों के नेताओं ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के सुरक्षित, समावेशी और सुव्यवस्थित उपयोग को सुनिश्चित करने के लिए 'ग्लोबल एआई गवर्नेंस पर लीडर्स स्टेटमेंट' (Leaders’ Statement on Global AI Governance) को अपनाया।

• डेटा अर्थव्यवस्था (Data Economy): डिजिटल डेटा और उससे जुड़ी अर्थव्यवस्था के सुचारु संचालन एवं सहयोग के लिए सदस्य देशों के बीच 'डेटा इकोनॉमी गवर्नेंस अंडरस्टैंडिंग' (Data Economy Governance Understanding) पर निष्कर्ष निकाला गया।

तकनीकी और डिजिटल मोर्चे पर ही सहयोग को और अधिक विस्तार देते हुए, ब्रिक्स देशों ने अंतरिक्ष अन्वेषण (space exploration) में मिलकर काम करने के लिए एक 'ब्रिक्स स्पेस काउंसिल' (BRICS Space Council) के गठन पर भी सहमति व्यक्त की है

👉ब्रिक्स में शामिल हुए नए सदस्य देशों के नाम बताएं।

ब्रिक्स (BRICS) में हाल ही में शामिल हुए नए सदस्य देश इस प्रकार हैं:

• वर्ष 2024 में शामिल हुए देश: ईरान, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), मिस्र और इथियोपिया ने 2024 में इस समूह की पूर्ण सदस्यता प्राप्त की।

• वर्ष 2025 में शामिल हुआ देश: 17वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान इंडोनेशिया आधिकारिक तौर पर ब्रिक्स का नया पूर्ण सदस्य बन गया है।

सऊदी अरब ने अभी तक अपनी ब्रिक्स सदस्यता को औपचारिक रूप नहीं दिया है, जबकि अर्जेंटीना ने (शुरुआत में शामिल होने की उम्मीद के बावजूद) 2024 में इससे बाहर रहने का फैसला किया था।

नए 'पार्टनर देश' (Partner Countries): पूर्ण सदस्यों के अलावा, 17वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में 10 अन्य देशों को 'पार्टनर देशों' के रूप में समूह में स्वागत किया गया है। ये देश हैं: बेलारूस, बोलीविया, कजाकिस्तान, क्यूबा, नाइजीरिया, मलेशिया, थाईलैंड, वियतनाम, युगांडा और उज्बेकिस्तान

👉भारत-ब्राज़ील के बीच हुए दुर्लभ पृथ्वी खनिज समझौते का क्या महत्व है?

चीन पर निर्भरता में कमी: वर्तमान में दुर्लभ पृथ्वी तत्वों की वैश्विक प्रसंस्करण आपूर्ति श्रृंखलाओं (processing supply chains) पर चीन का बहुत अधिक दबदबा है। यह समझौता भारत को एक ही देश (चीन) पर अपनी अत्यधिक निर्भरता को कम करने और अपने महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति के विकल्पों में विविधता लाने में मदद करेगा।

आपूर्ति श्रृंखला की मजबूती (Supply Chain Resilience): ब्राज़ील के पास दुर्लभ पृथ्वी खनिजों का बहुत बड़ा भंडार है, जिसमें से अब तक केवल 30% का ही अन्वेषण (explore) किया जा सका है। इस रणनीतिक साझेदारी से भारत की खनिज आपूर्ति श्रृंखला अधिक सुरक्षित और मजबूत बनेगी।

भविष्य की महत्वपूर्ण तकनीकों का विकास: यह समझौता भारत को उन महत्वपूर्ण खनिजों तक सीधी पहुंच प्रदान करेगा, जो इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माण, स्वच्छ ऊर्जा प्रौद्योगिकियों (Clean energy technologies), इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) और रक्षा प्रणालियों के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।

ग्लोबल साउथ का सशक्तिकरण: आपूर्ति श्रृंखला में विविधता लाने के साथ-साथ, यह साझेदारी ग्लोबल साउथ को मजबूत करने और बहुपक्षीय मंचों पर दक्षिण-दक्षिण सहयोग (South-South cooperation) को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण रणनीतिक कदम है



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